रावण का इतिहास ,जानते हैं कि रावण कौन था ?
रावण कौन था ? प्रस्तुत है उसकी जीवनगाथा !!
पूर्वकाल की बात है वैकुंठ लोक में जय-विजय नामक दो द्वारपाल थे. एक बार उन्होंने सनकादि बालक ऋषियों को वैकुंठ में जाने से रोक दिया था, उन्हें लगा कि बालकों को भला भगवान के पास क्या काम है. तब सनकादि ऋषियों में से एक ऋषि ने जय विजय को श्राप दे दिया कि तुम दोनों ने वैकुंठ लोक में मृत्युलोक जैसा नियम का पालन किया, स्वयं श्री हरि के द्वार पर सेवा में रहते हुये इतना ज्ञान भी नहीं है अत: तुम मृत्युलोक को प्राप्त हो जाओगे. दुसरे ऋषि ने कहा तुम्हें इस बात का भान भी नहीं कि श्री विष्णु लोक में यह परम्परा नहीं हो सकती. इसी बीच आवाज सुन कर स्वयं भगवान विष्णु उन सनकादि ऋषियों को लेने आ गये. जय-विजय ने ऋषियों से क्षमा माँगी. तीसरे ऋषि ने कहा कि श्राप वापस नहीं हो सकता, समय आने पर तुम्हें मृत्युलोक जाना ही होगा. और चौथे ऋषि ने कहा जैसे आज स्वयं नारायण हमें लेने आये है वैसे ही वो तुम्हें भी वापस वैकुंठ लोक लाने के लिये मृत्युलोक में आयेंगे.
दूसरा कारण यह था कि एक बार नारदजी को अपनी भक्ति पर अभिमान आ गया और वो हर लोक में जा जा के अपनी भक्ति और तपस्या का बखान करते थे. नारद ने अपने पिता ब्रह्मदेव को बतलाया कि पिताजी मैंने माया को अपनी तपस्या के बल से जीत लिया है. तब उन्होंने कहा नारद स्वयं अपनी भक्ति का बखान करना अच्छा नहीं है. नारद नही माने कुछ दिन बाद कैलाश में गये और वहाँ भोलेनाथ को अपनी तपस्या के बारे में बताया, उन्होंने भी कहा नारद आप हर जगह इस बात को कह रहे हो अच्छा नहीं है. लेकिन नारद अभिमान में थे कि समस्त लोकों में उन जैसा कोई नारायण भक्त नहीं है. कैलाश से लौटते हुये नारद वैकुंठ की ओर चले, तब नारद के अभिमान को नष्ट करने के लिये भगवान विष्णु ने एक माया नगरी का निर्माण किया. नारद वैकुंठ की ओर निकले तब मार्ग में उन्हें एक सुंदर नगर दिखाई दिया. नारद ने सोचा मैं सभी लोकों और नगर में गया हूँ पर इस नगर में नहीं गया, अत: यहाँ जा कर देखता हूँ कौन सा नगर है. नारद वहाँ पहुँचे, बहुत सुंदर नगर था इंद्र्लोक से भी सुंदर ,वहाँ के राजा ने नारदजी का सम्मान किया, महल में बैठाया और स्वयँ सपरिवार नारद जी को नमस्कार किया. जलपान आदि के बाद कहा, महर्षि आप तो चिरंजीवी, त्रिकालदर्शी महात्मा हैं मेरी पुत्री का स्वयँवर दो दिनों के बाद रखा गया है वैसे तो मैंने समस्त तीनों लोकों में खुला आमंत्रण दिया है कि जिसे भी मेरी पुत्री चाहेगी उसी से विवाह किया जायेगा परंतु यदि आप मुझे बता दें कि दामाद कैसा होगा तो मुझे आत्म संतोष हो जायेगा.
नारद जी ने उनकी पुत्री के हस्तरेखा देख कर कहा कि आपकी पुत्री बहुत भाग्यशाली है, इसे चिरंजीवी, अजर अमर, सुंदर और शतोगुणी प्रधान वर मिलेगा. जिसकी कीर्ति समस्त लोकों में होगी. नारद जी उस कन्या के रुप को देख कर मोहित हो गये उन्हें अपने आप में भी वो सब गुण नजर आये जो उसकी हस्तरेखा बता रही थी. इसके बाद नारद जी ने बिदा ली और वैकुंठ लोक को प्रस्थान किया.
रास्ते में विचार किया की मुझ में सारे गुण है लेकिन मैं अभी तक विवाह नहीं कर पाया हूँ. अब मुझे भी सप्तऋषियोँ की तरह अपनी गृहस्थी बसा लेनी चाहिये. विवाह के लिये अभी जिस कन्या को देखा वो उपयुक्त है. लेकिन एक कमी है वो है मेरा रुप वो थोडा तपस्वी संन्यासियों जैसा है पर उसकी चिंता की कोई बात नहीं क्योंकि मैं भगवान का भक्त हूँ और अभी जाकर भगवान विष्णु से उनका रुप माँग लूंगा और उन्हें अपने भक्त को देना ही पडेगा. ये विचार करते हुये नारद थोडे समय बाद वैकुंठ पहुँचे भगवान ने स्वागत किया, पूछा बहुत जल्दी में हो क्या बात है. नारद ने कहा भगवन ऐसे ही बहुत दिन हो गये आप से मिले हुये, भगवान भोलेनाथ से मिलकर आ रहा हूँ और अब आप से मिलने चला आया. अब वैसे भी मेरे पास समय ही समय है क्योंकि तपस्या और भक्ति मार्ग की उच्च अवस्था भी प्राप्त कर ली है, ज्ञानकाण्ड, कर्मकाण्ड और भक्ति में भी अब मैं चरम पर पहुँच चुका हूँ. माया को भी जीत चुका हूँ अब सोच रहा हूँ मैं भी गृहस्थ बन जाऊँ. रास्ते में एक कन्या को देख कर आ रहा हूँ जो सभी गुणों से युक्त है आपसे क्या कहूं भगवन आप तो सर्वज्ञ हैं और मैं तो आपका सब से बडा भक्त भी हूँ अत: आप मेरी सहायता कीजिए ।
भगवान ने मुस्कुराते हुये कहा नारद तुम गृहस्थ बनने की चाह में लगता है कन्या के सुंदर रुप से रोगग्रस्त हो गये हो अत: मैं अवश्य तुम्हारे इस रोग को दूर कर दूंगा, तुम चिंता मत करो. तुम मेरे सबसे बडे भक्त हो तो मुझे भी एक चिकित्सक की तरह से ही अपने भक्त के रोग को दूर करना होगा. नारद भगवान के इन गुढ वाक्यों को नहीं समझ पाये और बोले प्रभु मेरा रोग दूर करने का उपाय है मै स्वयं ही कर लूंगा बस आप मुझे अपना ही रुप दे दीजिये ताकि मैं सुंदरता में बिल्कुल आप जैसा ही दि खूं और वो कन्या मेरा वरण कर ले. भगवान ने कहा नारद मैं तुम्हारा चिकित्सक हूँ इसलिये मैं रोग को ठीक मै ही करुंगा तुम चिंता मत करो, एक चिकित्सक भला स्वयं अपने रोग को कैसे दूर कर सकता है..आप जाओ मै देख लूंगा. नारद ने कहा प्रभु मुझे आज्ञाँ दीजिए अब मैं चलता हूँ. नारद जी प्रसन्न थे कि अब वो भी भगवान विष्णु जैसे ही हो गये हैं और स्वयंवर के दिन पहुँचे. वहाँ तीनों लोक से बहुत से लोग आये थे, राजा ने सभी को बैठने को आसन दिये. नारद जी ने अनुमान लगाया पिछली बार राजा ने मुझे महर्षि कह कर चरण धोये पर, आज सिर्फ सामान्य तरीके से प्रणाम करके आसन दिया, इसका मतलब भगवान ने मुझे अपना रुप दे दिया तभी तो ये राजा आज मुझे नहीं पहचान सका.
स्वयँवर आरम्भ हुआ कन्या अपने लिये वर का चयन करने के लिये एक तरफ से आगे बढी और नारद जी एक दो बार अपनी जगह से खडे हुये, कन्या का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने के लिये और जैसे ही वो पास से निकली तो नारद जी अपनी गर्दन को आगे की तरफ झुका कर खडे हो गये. लेकिन कन्या आगे बढ गई और एक अन्य दिव्य पुरुष के गले में जयमाला डाल दी. कन्या का विवाह उनसे संपन्न हुआ. विवाह के बाद दो शिव गण जो वहाँ आये थे, वो नारद जी को देख कर बोले आप क्यों बार–बार ऊछल रहे थे. नारद को उनकी बात पर बहुत गुस्सा आया और बोले मूर्खो हँस क्यों रहे हो जानते नहीं मैं कौन हूँ? वो बोले ये तो पता नहीं कौन हो पर देखने पर लगते एकदम बंदर हो, वो बंदर जो मृत्युलोक पर पाये जाते हैं विश्वास न हो तो जाके जल मे देख लो अपनी सुंदर सी छटा को और जोर से हंसे.
नारद ने अपना मुँह जल में देखा तो वानर का सा मुँह नजर आया. शिव गण फिर बोले क्यों लग रहे हो ना मृत्युलोक के बंदर और पुन: जोर से हँसें. अब नारद जी को और अधिक क्रोध आ गया और उन्हें श्राप दे दिया कि तुम दोनों शिव गण हो, वेश बदलकर आये हो. कैलाश में रहते हो और मेरा उपहास करते हो, नारद का उपहास करके कहते हो मृत्युलोक का बंदर, इसलिये तुम्हें श्राप देता हूँ तुम्हारा कैलाश से पतन होगा और अब मृत्युलोक में जाओगे और वो भी राक्षस कुल में, और फिर बंदर ही तुमको पीटेंगे. इसके बाद नारद जी गुस्से से वैकुंठ लोक की ओर तेजी से बडे, उन्हें भगवान विष्णु पर बहुत गुस्सा आ रहा था. रास्ते में वही कन्या और वर भी विवाह के बाद जा रहे थे. जैसे ही नारद बारात को पार करते हुये आगे निकले तो पालकी से वर ने पूछ लिया, अरे नारद जी कहाँ चले बहुत जल्दी मे लग रहे हैं?
बस इस प्रश्न से ही नारद जी को क्रोध से आग जैसी लग गई और थोडा रुक के समझ आया तो बोले, ओह तो आप हैं अब मैंनें पहचान लिया है आप को. आप विष्णु भगवान हैं. वाह क्या बात है इतना बडा खेल, वो भी मेरे साथ,अपने भक्त के साथ वाह. मैंने आपको इस कन्या के बारे में बतलाया, जानकारी दी और आपने इस कन्या के रुप गुणों की चर्चा मुझ से ही सुनकर मुझे ही छला, और खुद रुप बदल कर दुसरा विवाह इस कन्या से किया. भगवान ने कहा नारद सुनो तो सही , पर नारद जी क्रोध से ऊबले हुये थे बोले हे हरि मेरे साथ छ्ल किया अब मेरा श्राप सुनो जैसे मैं पत्नी के वियोग में हूँ वैसे ही आप को भी श्राप देता हूँ कि आप भी पत्नी के वियोग में दुखी रहेंगे वो भी मृत्युलोक में, क्योंकि असली वियोग तो क्या होता है वहीं पता चलेगा और आप पत्नी के वियोग में मेरी तरह ही भटकेंगें. भगवान ने कहा नारद आपने श्राप दिया इसे स्वीकार करता हूँ और फिर अपनी माया हटा दी तब नारद ने देखा कुछ भी नहीं था ना वो नगर, न वो कन्या. नारद ने कहा यह क्या हुआ? भगवान ने कहा तुमने ही कहा था नारद की माया को जीत चुके हो इसलिये तुम्हारी परीक्षा ले रहा था. नारद ने श्री हरि से क्षमा माँगी और भगवान विष्णु अदृश्य हो गये.
इसी बीच वहाँ शिव गण भी आये उन्होंने कहा मुनिवर हम आपको न पहचान सके । आप के श्राप से अब हम कैलाश में प्रयत्न करने के बाद भी न जा सके , अच्छा हुआ आप हमें यहां मिल गए , इसलिए आप से निवेदन करने आये है की श्राप वापस ले लें जिससे हम पुनः महादेव के धाम को जा सकें। . नारद ने कहा श्राप मिथ्या तो नहीं होगा, अत: राक्षस तो तुम होओगे ही लेकिन इतना और कर देता हूँ कि तुम इतने पराक्रमी राक्षस बनोगे कि स्वयं भगवान श्री हरि ही तुम्हारे उद्धार के लिये आएँगे.
इसके अतिरिक्त तीसरा योग था प्रतापभानु जो चक्रवर्ती राजा होने के लिये लालच में ब्राह्मणों के श्राप का शिकार हो जाता है जिसकी कथा सीताजी के जन्म से भी जुडी है।
इन तीनों श्राप (जय-विजय, शिव गण और प्रतापभानु) से और इन सभी के अंश के रुप में प्रकट हुआ रावण. प्रतापभानु का राजसी गुण, शिव गणों का तामसी गुण और जय–विजय का शतो गुण, इन तीनों व्यक्तियों के गुणों की प्रधानता लिये जन्म लिया था रावण ने.
बाल्यकाल में ही रावण ने चारों वेद पर अपनी कुशाग्र बुद्धि से पकड बना ली, उसे ज्योतिषि का इतना अच्छा ज्ञान था कि, उसकी रावण संहिता आज भी ज्योतिष में श्रेष्ठ मानी जाती है. युवावस्था में ही रावण तपस्या करने निकल गया उसे पता था कि ब्रह्मा जी उसके परदादा हैं, इसलिये उसने पहले उनकी घोर तपस्या की और कई वर्षों की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे वरदान माँग़ने को कहा, तब रावण ने अजर–अमर होने का वरदान माँगा. ब्रह्मा जी ने कहा मैं अजर अमर होने का वरदान नहीं दे सकता हूँ तुम ज्ञानी हो इसलिये समझने का प्रयास करो. मैं तुम्हें वो नहीं दे सकता हूँ लेकिन बदले मैं अन्य शक्तियां देता हूँ. रावण तपस्या से शक्ति प्राप्त करके आया माता-पिता से मिला वे बहुत प्रसन्न हुए. अब थोडा अभिमान मन में आ गया और एक दिन, दो चार साथियों को लेके रावण अपनी युवावस्था में सहस्त्रबाहु अर्जुन के राज्य की सीमा में गया, वहाँ नर्मदा नदी के किनारे उसने देखा नदी की चौडाई बहुत होने के बाद भी उसमें जल बहुत कम था. रावण ने अपने साथीयों से कहा ये नदी का जल इतना कम कैसे है पहले तो इसमें बहुत जल भरा हुआ करता था. तब साथियों ने थोडा आगे बढकर देखा एक बाँध नजर आया जिसमें नदी का समस्त जल रोका गया था और बांध को बाणों से बनाया था. तब रावण के साथियों ने उसको बताया कि, किसी ने अपनी अद्भुत धनुर्विद्या के प्रयोग द्वारा बाणों से बाँधकर जल को रोका है. वो सब आगे बढे उन्हें कुछ शस्त्रधारी सुरक्षा में लगे सैनिक दिखे रावण ने पूछा कौन हो और ये बांध किसने बनाया है. उन लोगों ने कहा हमारे महराजा सहस्त्रबाहु ने बनाया है, वो इस समय अपनी पत्नियों के साथ विहार करने आये हैं.
रावण ने कहा अच्छा तो अब मेरा कौशल देखो और एक ही बाण से उसने बांध तोड दिया. सहस्त्रबाहु की पत्नियां जो स्नान करने के लिए गई थी बह गई काफी प्रयास करने के बाद उन्हें निकाला गया. रावण ने बांध तोड़ने की सूचना सहस्त्रबाहु को उसके सैनिकों ने दी तब इस बात पर सहस्त्रबाहु और रावण का युद्ध हो गया और रावण हार गया उसको बंदी बना लिया और जेल डाल दिया. उसके साथी भाग गये और रावण के दादा जी मुनि पुलस्त्य को बताया गया तब उन्होंने सहस्त्रबाहु अर्जुन के पास संदेश भेजा कि रावण युवक है और युवावस्था में गलती की सम्भावना हो जाती है इसलिये उसे छोड दो. अर्जुन ने उसे छोड दिया और चेतावनी दी कि दुबारा इस तरह की गलती न हो नहीं तो एक भी सर धड पर नहीं दिखाई देगा.
रावण को बहुत ग्लानि महसूस हुई और उसने वर्षो तक पुन: ब्रह्मा जी के लिये तप किया. और ब्रह्मदेव के प्रकट होने पर उसने फिर से अमर होने का वरदान माँगा. लेकिन इस बार भी उसे अमर होने का वरदान नहीं मिला लेकिन और ज्यादा मायावी शक्ति प्राप्त हुई. मायावी शक्तियां पा कर एक बार घूमते हुए वानरों के क्षेत्र में प्रवेश किया. शाम का समय था वानरों का राजा बालि उस समय एक वृक्ष के नीचे संध्या जप कर रहा था.
रावण उसे देख कर हँसा और फिर उसे छेडने लगा ऐ मर्कट, ऐ बंदर , अरे ओ कपि क्या कर रहा है? ऊठ बंदर होके पंडित बन रहा है ये संध्या वंदन तेरा काम है क्या ? बोल बोलता क्यों नहीं, इस तरह से उसका उपहास करने लगा और इसके बाद युद्ध करने के लिये उकसाने लगा. रावण को अपनी मायावी शक्ति पर घमंड आ गया था वो बालि से कहा अरे मर्कट मैंने सुना है तू बहुत शक्तिशाली है, आ जरा मुझसे युद्द कर के देख, तेरा दांत कैसे तोडता हूँ और अभिमान मैं कैसे ढीला करता हूँ. लेकिन बालि ध्यान में था इसलिये उसने इसकी बात को सुना ही नहीं. इसके बाद रावण ने उसको जोर से लात मारी और बोला पाखंडी मेरे ललकारने के बाद मेरे डर से ध्यान में बैठा है, सीधे-सीधे बोल कि मैं नहीं लड सकता. अब बालि क्रोध से ऊबल पडा उसने रावण को पटक-पटक कर इतनी मार मारा कि बस वो सिर्फ मरने से ही बचा और फिर उसे अपनी पूँछ में बाँध कर लपेट लिया, पुन: संध्या वंदन समाप्त करके उसने रावण के गर्व को चूर-चूर कर दिया. छ: महीने तक बालि ने उसे अपनी कैद में रखा एक दिन प्रात: काल बालि उसे अपने बाँए हाथ से उसको अपनी काँख में दबाकर समुद्र की ओर जा रहा था. उसने सूर्य को अर्घ्य देनेके लिये अपने हाथों मे जैसे ही जल लिया तभी रावण भाग निकला. ऐसा भागा की तुरंत पानी में माया से अदृश्य हो गया बाली को दिखाई ही नहीं दिया कि किधर भागा.
अब रावण को पता चला कि उससे भी बलशाली लोग हैं मुझे ही पितामह की वजह से अभिमान ज्यादा था. इसके बाद वो फिर से घोर तपस्या करने निकल पडा और फिर से उसने अमर होने का वरदान माँगा. ब्रह्मा जी प्रकट हुये और कहा पुत्र मेरे अधिकार मे वो वरदान नहीं है और इस बार उसने ब्रह्मा जी से प्रचंड शक्तियां और ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया. एक दिन देवताओं से किसी बात पर नाराज हो गया और उसने स्वर्ग में अकेले ही चढाई कर दी और घोर युद्ध में उसने अकेले ही सभी देवताओं को परास्त कर डाला. इंद्र, यम, वरूण अन्य सभी दिकपाल और प्रजापतियों को बंधक बना लिया अन्य सभी देवता स्वर्ग से भाग निकले, उसने स्वर्ग लोक पर अधिकार कर लिया और बाद में उसे देवताओं को लौटा दिया, लेकिन देवताओं का मान भंग हो गया वो चुपचाप हो गये. दानवों को पता चला कि उनका भांजा रावण अकेले ही स्वर्ग में सभी देवताओं को परास्त कर दिया तीनो लोकों में इस बात का पता चला और इस बात से दानव बहुत प्रसन्न हो गये उनकी वर्षो की मनोकामना पूर्ण हो गयी और दानवों ने रावण की जय जयकार की और रावण को अपना राजा बनने कि प्रार्थना की. दानवों ने रावण से कहा कि देवताओं ने हमें स्वर्ग से निकाल दिया, न हमे तप करने देते है न शक्ति प्राप्त करने देते है. कभी हम भी स्वर्ग मे रहते थे, महलों में थे आज हम में से अधिकांश गुफा कंदराओं में शिकार इत्यादि का भक्षण कर जीवन जीने की आदत डाल चुके हैं इन देवताओं के भय से जीवन यापन कर रहे हैं. इसलिये हे रावण हे दशानन आप अब हमारी रक्षा करें और आप हमारे राजा बनें. आपकी माता जी हमारे कुल की हैं अत: आप हमारे रिश्ते में भी है.
रावण ने कहा ठीक है मै तुम सब को वचन देता हूँ आज के बाद कोई भी देवता तुम्हे परेशान करने का साहस भी किया तो मै उसको बंदी बना लूंगा. उसके ये शब्द सभी दिशाओं में गूंज गये. रावण के तेज और उसके भव्य स्वरूप और नेतृत्व से प्रसन्न होकर मय दानव ने अपनी अत्यंत सुंदर और मर्यादा का पालन करने वाली पुत्री मंदोदरी का विवाह रावण के साथ किया और रावण पत्नी रुप में मंदोदरी को पा के प्रसन्न हुआ. पतिव्रता नारियों में मंदोदरी का स्थान देवी अहिल्या के समकक्ष है. रावण राजा के रुप में राक्षसों द्वारा प्रतिष्ठित हो गया तो फिर उसने अपने लिये राजधानी का निर्माण करने की सोची, वो फिर से स्वर्ग गया शायद राजधानी बनाने के लिये ये ठीक रहे, सभी देवता इंद्र, यम, वरुण उसे देख भाग लिये, वो प्रसन्न हुआ लेकिन उसे स्वर्ग पसंद नहीं आया. वापसी में लौटते समय उसे समुद्र में त्रिकूट पर्वत पर सुंदर नगर नजर आया. वो सीधे उधर गया वहाँ उसने देखा उसका ही सौतेला भाई कुबेर यक्षों के साथ रहता है उसने कुबेर को उस नगर को यक्षों सहित खाली करने को कहा. कुबेर अपने पिताजी के पास गया और कहा पिताजी आज भ्राता रावण आया था और जबरन लंका खाली करने को कह रहा है.वो वहां रहना चाहता है. तब उन्होंने कहा पुत्र रावण मानने वालों में नहीं है अत: तुम उसे वो स्थान दे दो. तुम उत्तर दिशा में सुरक्षित स्थान में चले जाओ वहाँ तुम्हें कोई तंग नही करेगा. अपने पिता के आदेशानुसार कुबेर ने हिमालय क्षेत्र में अल्कापुरी नाम से नगर का निर्माण मानसरोवर झील के पास कर लिया और यक्षों सहित लंका से जितना धन लेकर जा सकता था उतना साथ लेकर चला गया.
रावण ने त्रिकूटपर्वत पर लंका को बहुत सुंदर बनवाया. उसके ससुर मय नामक दानव ने जो मायवी विद्याओं में अत्यंत निपुण था, उसने विश्वकर्मा को बुलाकर लंका को तीनों लोकों मे सबसे सुंदर नगर बना दिया. सोने से और हीरे जवाहारात, मणिया से लंका के सभी दीवार, खंम्भे आदि को मढ़ दिया और जब इन की कमी मह सूस हुई तो रावण, कुबेर से छीन कर ले आया. रावण ने सभी राक्षसों को लंका में रहने का निर्देश दिया और सभी को एक से एक सुंदर घर और महल दिये, फिर एक दिन कुबेर से पुष्पक विमान भी छीन लिया. राज्य स्थापना और सुंदर राजधानी बसा कर सभी असुरों को अच्छी तरह से सब सुख सुविधाएं युक्त महल आदि उपलब्ध करा कर और उन्हें पूर्ण रुप से सुरक्षित कर रावण फिर से ब्रह्मदेव की तपस्या में लग गया. उसे देख बाद में उसके भाई कुम्भकर्ण और विभीषण भी उसके साथ तपस्या में आ गये. ब्रह्मा जी फिर रावण के पास आये रावण ने कहा पितामह मुझे अमरता का वरदान चाहिये.
ब्रह्मदेव ने कहा मै तुमसे कई बार कह चुका हूँ वो मेरे लिये देना सम्भव ही नहीं है. लेकिन रावण नहीं माना ब्रह्मा जी चले गये. रावण पुन: तप में लगा रहा और वर्षों बाद घोर तपस्या से ब्रह्मा जी फिर रावण के पास आये उसको समझाया कि, देखो अजर–अमरता वाला वरदान मत माँगो. संसार के नियम को फेरने की शक्ति मुझ में नहीं, मैं मर्यादा में ही काम कर सकने की शक्ति रखता हूँ. पुत्र तुम मेरी तपस्या बार–बार कर रहे हो और मुझे व्यवधान हो रहा है इसलिये जितना हो सकता है मैं ऊतना तुम्हें आज दे देता हूँ. तुम्हारी नाभि में, मैं एक अमृत कुंड प्रदान करता हूँ और जब तक यह अमृत कुंड तुम्हारी ना भि में रहेगा तब तक तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी. यदि तुम इस पर भी संतुष्ट नहीं हो और अजर-अमर होना चाहते हो, तो बेहतर है तुम महादेव की शरण में जाओ. महादेव के बारे में मैं नहीं जानता वो अमर होने का वरदान देंगे या नहीं, किंतु मेरे वश में तो नहीं है.
रावण ने फिर ब्रह्मा जी से पूछा कि पितामह यह अमृत कुंड नाभि में कब तक रहेगा? तब ब्रह्मा जी ने कहा अग्नि बाण के अतिरिक्त इस अमृत कुंड को कोई नहीं सूखा सकता है रावण ने सोचा लगभग अमर होने जैसी बात है, क्योंकि अग्नि बाण का प्रयोग भगवान विष्णु के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं कर सकता है इसलिये उसने ब्रह्मा जी से कहा पितामह अब आप अजर अमर होने का वरदान तो नहीं दे रहे हैं इसलिये मैं इसे स्वीकार कर लेता हूँ पर आपको और भी कुछ देना होगा. ब्रह्मा जी ने कहा तुम अमर होने के अतिरिक्त अन्य जो माँगो मैं देने को तैयार हूँ तब रावण ने वरदान ऐसे माँगा कि उसको देव, दनुज, नाग, यक्ष, किन्नर, गंधर्व कोई भी युद्द में न मार सके. ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह दिया. इसी समय ब्रह्मा जी की दृष्टी एक अप्सरा पर पडी जो पास में जो छुपके से अपना कान लगा के सुन रही थी कि ब्रह्मदेव रावण को क्या वरदान दे रहे हैं. ब्रह्मा जी समझ गये कौन है किसने भेजा है और वो अप्सरा घबराते हुए ब्रह्मा जी को प्रणाम करती है लेकिन उसका इस तरह छुप कर देखना ब्रह्मा जी को अच्छा नहीं लगा, उन्होंने सिर्फ उस अप्सरा को इतना ही कहा ‘’जब तुमने छुप के सुन ही लिया है तो इतना और भी सुन लो कि, जिस दिन किसी वानर का जोरदार मुक्का तुम्हारे इसी कान पर पडेगा, उस दिन समझ लेना रावण और राक्षसों का अंत आ गया”
ब्रह्मा जी चले गये और अप्सरा चुपके से भागने वाली थी, कि रावण ने उसे पकड लिया और बोला कौन हो यहाँ क्या कर रही हो? उसने बताया कि ‘युँ ही ब्रह्मदेव क्या कह रहे है वो देखने आई थी. रावण समझ गया कि देवताओं की चाल है इसलिये उसने उस अप्सरा को कहा तुम्हें बहुत ज्यादा कान लगा के सुनने की आदत है इसलिये अब मेरे साथ चल अब लंका के द्वार पर, वहाँ कोई घुसे तब कान लगा के सुनना और रखवाली करना और उसे लंकिनी नाम से मुख्य द्वार पर रखवाली के लिये रख दिया.
रावण अब तपस्या जनित अपनी शक्ति की लगभग चरम सीमा पर पहुँच गया था इसलिये अभिमान भी स्वाभाविक था. सभी राक्षस उसकी छत्र छाया में सुरक्षित थे उनमें से कई राक्षस वो पहले देवताओं के भय से तपस्या नहीं कर पा रहे थे, वो तपस्या करने लगे शक्ति प्राप्त करने के लिये और अन्य सभी राक्षस लंका में आनंद और एश्वर्य का भोग करने लगे.
एक दिन रावण अपने अभिमान और ऐश्वर्य के बल पर अकेले ही त्रिलोक में विजय के लिये निकला और सुतल लोक में गया. वहाँ सुतल लोक में राजा बलि राजमहल में थे और रावण बडे अभिमान और गरजना के साथ उनके द्वार पर गया और द्वार पाल को बोला “ बलि को बोलो रावण युद्ध के लिये आया है” रावण ने जब द्वार पाल को जबरन धमकाकर बोला, तो द्वारपाल ने कहा “हे लंकापति रावण, महाराज बलि इस समय पूजा में है और पूजा की समाप्ति के बाद वो तुमसे अवश्य लडगें, चिंता मत करो धैर्य रखो, वो भगवान भक्त हैं इसलिये पहले वो उस काम को ही पूरा करंगे, उसके बाद वो अपना ये सामने रखा कवच पहनने को यहाँ आएंगे तब तुम्हारा संदेश उन्हें हम यहीं तुम्हारे सामने ही दे देंगे”. रावण अभिमान में चूर था और बोला “अच्छा इस कवच को पहनेगा वो मैं इसे अभी तोड देता हूँ.”
रावण आगे बडा और उस कवच को उठाने की कोशिश करने लगा, लेकिन वो इतना भारी था कि रावण को उठाने में पसीना आ गया. द्वारपाल ने कटाक्ष किया लंकापति रावण, हमारे महाराज बलि का कवच तक उठाने में आपके माथे पर पसीना निकल आया है मुझे संदेह हो रहा है कि तुम महाराज बलि से कैसे लड पाओगे कोई बात नहीं कुछ ही समय की बात है और आप धैर्य रखें. रावण मन में डर गया और बाद में आता हूँ कहकर भाग निकला, वापस नहीं आया. रावण ने सभी देवताओं, यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि को युद्द में परास्त करके राक्षसों को अभय कर दिया और मानवों को वो पहले से ही सोचता था कि, वो क्या लडगें बेचारे सीधे साधे लोग है इसलिये पृथ्वी के अन्य भू भागों पर उसके राक्षस अपनी चला ही रहे थे.
यद्यपि शक्तिशाली राज्यों, जिनमें अयोध्या, मिथिला, कौशल जैसे अन्य राजा थे, वो बहुत उच्च कोटी के प्रतापी और सक्षम राज्य थे और कभी सीमा विस्तार के लिये युद्ध नहीं करते थे, ये राजा सन्मार्गी और नारायण भक्त थे, उनकी प्रजा भी सुखी संपन्न और उच्च कोटी की थी. महाराजा दशरथ तो इतने प्राक्रमी थे कि, देवराज इंद्र ने तक उनसे युद्ध में सहायता माँगी थी. राजा जनक इतने श्रेष्ठ राजा थे कि उन्हें प्रजा के, हित के कार्यो और संत सेवा में अपनी देह की सुध तक नहीं होती थी और इसलिये उनका नाम विदेह भी पड गया था. एक से बढकर एक ऋषी, महर्षी, मुनि जिनमें परशुराम, विस्वामित्र, बामदेव जैसे लोग इन राजाओं के दरबार में आते थे और इसी वजह से इनके राज्य को टेडी आँख देखने का साहस तीनों लोकों में स्वत: ही कोई नहीं कर सका.
एक प्रश्न ये कि रावण, सहस्त्रबाहु अर्जुन से, फिर बालि से मार खाया, फिर सुतल लोक में बलि के डर से भाग गया, अयोध्या, मिथिला, कौशल, वानरों के प्रदेश आदि उसके अधीन नहीं थे, फिर रावण त्रिलोक विजेता कैसे मान लिया गया? रावण ने ब्रह्मा जी से नाभी कुंड मे अमृत पाया इससे उसकी मृत्यु सिर्फ भगवान नारायण के अतिरिक्त किसी और से नहीं हो सकती है इस बात का उसको ज्ञान था, मन में ग्लानि थी कि, अगर-अमर हो जाता तो कितना अच्छा रहता क्युँकि उसका लक्ष वही था और उसके लिये वो प्रयत्नशील था. लेकिन सिर्फ अमर रहने से कोई बात नहीं बनती है बल, कौशल और शस्त्र भी चाहिये. उसके लिये उसने तपस्या से बहुत कुछ पाया भी. उस समय रावण जैसे कई अन्य तपस्वी भी थे, राजा बलि, वानर प्रदेश का राजा बालि, बाणासुर आदि.
रावण ने ब्रह्मा जी से वरदान पाने के बाद सोचा अब वो अमरता का वरदान पाने के लिये महादेव को ही प्रसन्न कर के रहेगा और वरदान ले के रहेगा. रावण ने भगवान भोले नाथ की तपस्या आरम्भ कर दी, वर्षों तक तपस्या की, भोले नाथ प्रकट नहीं हुये, रावण ने सोचा भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न होने वाले महादेव हैं और मुझसे ही लगता है अप्रसन्न हैं ये सोच कर उसने और कठोर तपस्या करना शुरु कर दिया, कभी निराहार रह कर तो कभी भगवान भोलेनाथ की सुदंर स्त्रोतों से वीणा वादन कर, लेकिन प्रभु पृकट नहीं हुए. रावण ने सोचा उसका जीवन ही बेकार है अगर वो महादेव को प्रसन्न न कर सका, महादेव जो शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं अपने भक्तों पर, और मैं ही उनको प्रसन्न न कर सका ये सोच कर आत्मग्लानि से भर गया. एक दिन वो पूजा में जब पुष्प चढाने लगा तो पुष्प कम पड गये, तब उसने पूजा को पूर्ण करने के लिये उसने एक-एक कर अपना मस्तक काट कर पुष्प की जगह चढाना शुरु कर दिया, ये सोच के कि जो अपने जीवन में महादेव को प्रसन्न नहीं कर सका तो उस जीने वाले को धिक्कार है. [ भगवान की पूजा मे पुष्प को चूर्ण चूर्ण कर के नही चढाना चाहिये वल्कि सम्पूर्ण पुष्प को चढाया जाता है. इस कारण पूजा के पुष्प कम पढने पर रावण ने एक पुष्प को ही चूर्ण कर करके नही चढाया वल्कि अपने शीष को चढा दिया. पुष्प हर चीज का प्रतिनिधित्व करता है जैसे धूप दीप नैवेद्य वस्त्र के न होने पर पुष्प को ही चढाया जा सकता है.]
रावण ने पुष्प की जगह महादेव को शीश अर्पण किया, दर्द से रावण बेसुध सा हो गया लेकिन मुँह से हर हर महादेव कहना नहीं छोडा. अंतिम सिर से झुक कर महादेव को अंतिम प्रणाम कर जैसे ही खड्ग प्रहार अपनी गर्दन पर करने के लिये ऊठाई तभी महादेव ने प्रकट हो उसका हाथ पकड लिया, बोले रावण मुझे बहुत प्रसन्नता हुई, तुमने मेरे लिये अपने प्राण संकट में डाल दिये, माँगो क्या चाहिये. रावण दर्द को सहता हुआ महादेव के चरणों में प्रणाम करता हुआ, अति विनम्र होके बोला “हे देवाधिदेव महादेव मुझे आपके दर्शन हो गये, आप मुझ से प्रसन्न हो गये ये मेरे लिये काफी है मुझे अब और कुछ नहीं चाहिये. यद्यपि मैं माँगने की ईच्छा से ही तप कर रहा था, लेकिन आप के इस सुंदर स्वरूप को देखकर ही मैं धन्य हो गया, आप प्रसन्न हो गये मुझे इस बात से पूर्ण संतोष है प्रभु और मुझे कूछ नहीं चाहिये, आपने मुझे दर्शन दे दिये, मेरे लिये इससे बडा वरदान कुछ नहीं, अत: मुझे कुछ नहीं चाहिये.
महादेव ने कहा रावण मैं तो तुम्हारे संकल्प से ही वरदान देने के लिए आया हूँ अत: ऐसे तो जा ही नहीं सकता हूँ. अत: तुम नि:संकोच होके माँगो, तुम्हें जो चाहिये तुम माँग लो. मै अवश्य दुंगा. रावण ने कहा “हे महादेव, हे देवाधिदेव, हे भक्तवत्सल यदि आप देना ही चाहते हैं, तो मुझे आपकी अटुट भक्ति दे दीजिये जिससे मैं सदा आपके “नम: शिवाय” रुपी मंत्र का जप करता रहूँ, इसके अतिरिक्त मुझे कुछ भी नहीं चाहिये. महादेव उसकी बात सुन अत्यंत प्रसन्न हुये, जिसका लक्ष था अमरता प्राप्त करना और वो प्रभु भक्ति माँग रहा है इससे बढा ज्ञानी और कौन हो सकता है. तब महादेव ने उसे अपनी भक्ति प्रदान की और वरदान दिया कि, तुम्हारे शीश पुन:आ जाएंगे इसके अलावा जब भी कोई अंग कट जाएगा उस के स्थान पर पुन: नया अंग़ स्वत: ही उग आएगा. महादेव जानते थे कि रावण को बालि और अन्य लोगों से युद्ध में हार जाने की ग्लानि मन में है कि वो शारारिक रुप से उतना बलशाली नहीं है इसलिये महादेव ने भक्ति के अतिरिक्त उसे बहुत अपार बल भी बिना मांगे दे दिया और साथ में पाशुपत नामक अस्त्र दिया. महादेव अंतर्ध्यान हो गये.
महादेव से बल पाकर जब वह जैसे ही अपने स्थान से ऊठा और वापस चलने के लिये कदम जोर से आगे रखा तो तो पृथ्वी एक बार कम्पन हुआ, रावण ने पुन: जोर से अपना पैर इधर उधर रखा उसने देखा पृथ्वी हिल रही है, तो वो बहुत आनंदित हुआ और पुन: महादेव को मन में प्रणाम कर वो लौट के लंका में आ गया. महादेव का रावण प्रिय भक्त बन गया, लंका से प्रतिदिन पुष्पक विमान से कैलाश जाता था और वहाँ भगवान महादेव की पूजा और अराधना करता था. रावण ने तीनों लोकों को अपनी गति से चलाने वाले नौ ग्रहों को जब अपने अधीन कर लिया, और दिगपालों से उसने अपने लंका के मार्गो मे कई बार जल छिड्काव के काम में लगा दिया था, तब उसे एक तरह से त्रिलोक विजेता माना गया, क्युँकी त्रिलोक का संचालन करने वाले सभी देवता, नौ ग्रह उसके अधीन थे और अब उसे भी पराजित करने वाला त्रिलोक में कोई नहीं था इसके साथ ही उसने तीनों लोकों में रहने वाले अधिकांश भागों को अपने अधीन कर लिया था.
एक बार नारद जी फिर से लंका आये,वो पहले भी आ चुके थे. रावण ने उनकी बहुत अच्छी सेवा की, नारद जी ने रावण को कहा “सुना है महादेव से बल पाए हो रावण ने कहा हाँ आपकी बात सही है. नारद ने कहा कितना बल पाए. रावण ने कहा यह तो नहीं पता परंतु अगर मैं चाहूँ तो पृथ्वी को अपने चलने फिरने से ही हिला डुला सकता हूँ. नारद ने कहा तब तो आपको उस बल की परीक्षा भी लेनी चाहिये क्युँकि व्यक्ति को अपने बल का पता तो होना ही चाहिये. रावण को नारद की बात ठीक लगी और सोच के बोला महर्षि अगर मैं महादेव को कैलाश पर्वत सहित ऊठा के लंका में ही ले आता हूँ ये कैसा रहेगा? इससे ही मुझे पता चला जायेगा कि मेरे अंदर कितना बल है. नारद जी ने कहा विचार बुरा तो नहीं है और उसके बाद चले गये. एक दिन रावण भक्ति और शक्ति के बल पर कैलाश समेत महादेव को लंका में ले जाने का प्रयास किया. जैसे ही उसने कैलाश पर्वत को अपने हाथों में ऊठाया तो देवि सती फिसलने लगी, वो जोर से बोली ये क्या हुआ ये आकस्मिक भूकम्प कैसे, उन्होंने महादेव से पूछा कि भगवन ये कैलाश क्युँ हिल रहा है. महादेव ने बताया हमारा भक्त रावण हमें लंका ले जाने की कोशिस में है. रावण ने जब महादेव समेत कैलाश पर्वत को अपने हाथों में ऊठाया तो उसे बहुत अभिमान भी आ गया कि यदि वो महादेव सहित कैलाश पर्वत को ऊठा सकता है, तो अब उसके लिये कोई अन्य असम्भव भी नहीं और रावण जैसे ही एक कदम आगे रखा तो उसका बैलेंस डगमगाया. देवी सति ने कहा रावण रुको इस तरह से न करो, कैलाश मे चीजें इधर उधर होकर अपने स्थान से गिर रही हैं. लेकिन इसके बाद भी वो सुने का अंसुना किया और अपनी कोशिस में लगा रहा और इतने में देवि सती एक बार फिर फिसल गई उन्हें क्रोध आ गया उन्होंने रावण को श्राप दे दिया कि “अरे अभिमानी रावण तु आज से राक्षसों में गिना जाएगा क्युँकि तेरी प्रकृति राक्षसों की जैसी हो गई है तु अभिमानी हो गया है. इस पर भी रावण ने देवि सती के शब्दों पर ध्यान नहीं दिया, तब भगवान शिव ने अपना भार बढाना शुरु किया और उस भार से रावण ने कैलाश पर्वत को धीरे से उसी जगह पर रखना शुरु किया और भार से उसका एक हाथ दब गया और वो दर्द से चिल्लाया उसके चिल्लाने की आवाज स्वर्ग तक सुनाई दी और वो कुछ देर तक मूर्छित हो गया और फिर होश आने पर उसने भगवान महादेव की सुंदर स्तुती की लय और ताल के साथ मृदंग और वीणा वादन करके उसने स्व रचित स्त्रोत ”जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्... से भोलेनाथ ने स्तुति की .
उसकी लय ताल और ध्वनि से प्रसन्न होके महादेव ने कहा कि रावण यद्यपि मैं नृत्य तभी करता हूँ जब क्रोध में होता हूँ, इसलिये क्रोध में किये नृत्य को तांडव नृत्य नाम से संसार जानता है. किंतु आज तुमने अपनी इस सुंदर स्त्रोत से और सुंदर गायन से मेरा मन प्रसन्नता पूर्वक नृत्य करने को हो गया. कालांतर में रावण द्वारा रचित और गाया हुआ यह स्त्रोत शिव तांडव स्त्रोत कहलाया क्युँकि भगवान शिव का नृत्य तांडव कहलाता है परन्तु वह क्रोध मे होता है लेकिन इस स्त्रोत में भगवान प्रसन्नता पूर्वक नृत्य करते हैं. इसके उपरांत भगवान शिव ने रावण को प्रसन्न होके चंद्रहास नामक तलवार दी, जिसके हाथ में रहने पर उसे तीन लोक में कोई युद्द में नहीं हरा सकता था. इसी कारण वो एक तरह से त्रिलोक विजेता कहा जाने लगा.
देवी सती के श्राप के बाद से ही रावण की गिनती राक्षसों में होने लगी और राक्षसों की संगति तो थी ही, इसलिये राक्षसी संगति में अभिमान, गलत कार्य और भी बढते चले गये, श्राप के पहले वो ब्राह्मण था और सात्विक तपस्या करता था. ब्रह्मदेव और महादेव की पूजा का जल लाने का कार्य भी देवताओं को दिया था. लेकिन बाद में वो सात्विक से तामसी प्रवृत्ति में पड गया अभिमान और असुरों की संगति इन दो कारणों से रावण पतन को प्राप्त हुआ.
रावण से ज्यादा रावण के नाम का फायदा ऊठाया दूसरे राक्षसों ने, उसके नाम पर कर वसूली, सिद्द, संतों मुनि जनों का अपमान होने लगा. राक्षसों ने देवताओं से अपना बैर निकालने के लिये, वो कभी गायों को (पृथ्वी समझ कर कि ब्रह्मा जी के पास गयी थी, इसका भेद पूछने के लिये) और ब्राह्मणों इसलिये कि, स्वर्ग में बहुत कम देवता ही रह गये है शायद ये रुप बदल कर देवता ही ब्राह्मण हैं और संत बन के देवताओं की मदद कर रहे हैं राक्षस जहाँ तहाँ सभी को त्रास देने और मारने लगे. जिससे पृथ्वी पर पाप रुपी भार और अधिक बढ गया. लेकिन रावण ने अपने इन अनुचरों के कुकृत्यों पर ध्यान नहीं दिया. जिससे पृथ्वी पर अनाचार बढ गया और उसे गौ रुप में ब्रह्मदेव के पास जाना पडा.और तब भगवान को श्री राम रूप में अवतार लेना पड़ा !!
जय श्री राम
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