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सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या पर:

तनाव के उन क्षणों में मजबूत लोग भी आत्महत्या कर लेते हैं.. वो लोग जिनके पास सब कुछ है  शान ... शौकत ... रुतबा ... पैसा .. इज्जत  इनमें से कुछ भी उन्हें नहीं रोक पाता ..   तो फिर क्या कमी रह जाती है ??? कमी रह जाती है उस ऊँचाई पर  एक अदद दोस्त की कमी होती है  उस मुकाम पर  एक अदद राजदार की एक ऐसे दोस्त की जिसके साथ "चांदी के कपों" में नहीं  किसी छोटी सी चाय के दुकान पर बैठ  सकते .. जो उन्हें बेतुकी बातों से जोकर बन कर  हंसा पाता ... वह जिससे अपनी दिल की बात कह हल्के हो सके.. वह जिसको देखकर अपना स्ट्रेस भूल सके वह दोस्त वह यार  वह राजदार  वह हमप्याला उनके पास नहीं होता  जो कह सके तू सब छोड़ ... चाय पी मैं हूं ना तेरे साथ ... और आखिर में  यही मायने कर जाता है... सारी दुनिया की धन दौलत एकतरफ...सारा तनाव एक तरफ .. वह दोस्त वह एक तरफ !!! लेकिन अगर आपके पास  वह दोस्त है वह यार है तो कीमत समझिये उसकी...  चले जाइए एक शाम उसके साथ  चाय पर ...  जिंदगी बहुत हसीन बन जाएगी......  याद रखिए आपके तनाव से यदि को...

"इलाहाबाद " ख्वाबों का शहर

हनुमान जी जैसे कर्मठी व्यक्ति भी जिस शहर में आकर लेट गये उसी का नाम है इलाहाबाद “हनुमान” जैसा कर्मठी व्यक्ति भी इस शहर में आकर लेटे हनुमान हो गया। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि क्या हनुमान जी ने किसी विद्यार्थी के कमरे पर दाल भात चोखा तो नहीं न खा लिया था जो अलसिया के सो गये? माया है भईया इस शहर कि यहां सीनियर “चीन” बनके रहता है और जूनियर “ताइवान”.. हॉस्टल में रहने वाला “अमेरिका” तो डेलिगेसी में रहने वाला उस की सरपरस्ती में पलने वाला “दक्षिण कोरिया”। यहां रहकर आप कुछ सीख पाएं या न सीख पाएं “डीलिंगबाजी” और शानदार “खाना बनाना” जरूर सीख जाएंगे और “फेमिनिज्म” के लिहाज से यह एक प्रगतिशील कदम है। दुनिया के किसी भी शहर में रहने वाला व्यक्ति अपने शहर को और अपने विश्वविद्यालय को इतना याद नहीं करता होगा जितना कि इस शहर के लोग और हा अगर जान का डर न रहे तो वह अपनी छाती फाड़ के दिखा दें कि यह शहर उन के दिल में बसा हुआ है …और आखिर हो भी क्यों ना…! यह शहर उनके लिए केवल शहर नहीं है वरन् उनके जीवन का वह बेहतरीन वक़्त है जिसमे उन्होंने खुद को निर्मित किया है परिमार्जित किया है। यहां उन्हें वह लोग मिले हैं जि...

जिजीविषा

 # *जिजीविषा*  गर्मी की छुट्टी आते ही गांव नामक निरीह शब्द पर एक साथ कई हमले होतें हैं..पहला हमला होता है दिल्ली,नवेडा, लोधियाना से पधारे मोहन गुड्डू और सुग्गन,भोला,राधेश्याम,बब्बन,मुन्ना टाइप प्रजाति का. इस प्रजाति के लोग दो साल पहले गांव छोड़ चुके होतें हैं..गाँव छोड़ने की वजह ये होती है कि ठीक दो साल पहले किसी ममता,बबिता,कलावती,विमला से इनकी शादी हो गयी होती है। शादी बाद इनका दुलहिन प्रेम इतना फफाने लगता है कि ये रात को आठ बजे ही किल्ली लगाकर सो जातें हैं, और सुबह दस बजे तब उठतें हैं,जब इनके बाबूजी खेत में गोबर फेंकने के बाद, दतुवन-कुल्ला करके गाय को लेहना देने के पश्चात नहा रहे होतें हैं.वहीं हैण्डपम्प चलाती गुड़िया से धीरे से पूछते हैं.. "गुड्डआ उठले ना रे अभी.. नौ बज गइल" ? गुड़िया धीरे से मुड़ी हिलाकर "ना" में जबाब देती है.इस गोपनीय जानकारी के बाद इनके बाबूजी के मुख से  उत्प्रेक्षा,श्लेष,यमक अनुप्रास के रस में लिपटा,लक्षणा,व्यंजना की धधकती आग में पका,जो दिव्य और ओजपूर्ण वाक्य निकलता है,वो एस्थेटिक्स के नवेदितों,पिंगल के पढ़वइयों,ग़ज़ल के गवइयों के साथ हिंदी के स्वनाम...

प्रभु श्री राम चन्द्र जी का केवट से संवाद एवम् भगवान श्री विष्णु एवम् कछुए से इस प्रसंग की प्रासंगिकता

क्षीर सागर में भगवान विष्णु शेष शैया पर विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रही हैं । विष्णुजी के एक पैर  का अंगूठा शैया के बाहर आ गया और लहरें उससे खिलवाड़ करने लगीं ।  . क्षीरसागर के एक कछुवे ने इस दृश्य को देखा और मन में यह विचार कर कि मैं यदि भगवान विष्णु के अंगूठे को अपनी जिव्ह्या से स्पर्श कर लूँ तो मेरा मोक्ष हो जायेगा,यह सोच कर उनकी ओर बढ़ा ।  . उसे भगवान विष्णु की ओर आते हुये शेषनाग ने देख लिया और कछुवे को भगाने के लिये जोर से फुँफकारा । फुँफकार सुन कर कछुवा भाग कर छुप गया ।  . कुछ समय पश्चात् जब शेषजी का ध्यान हट गया तो उसने पुनः प्रयास किया । इस बार लक्ष्मीदेवी की दृष्टि उस पर पड़ गई और उन्होंने उसे भगा दिया ।  . इस प्रकार उस कछुवे ने अनेकों प्रयास किये पर शेष नाग और लक्ष्मी माता के कारण उसे  सफलता नहीं मिली । यहाँ तक कि सृष्टि की रचना हो गई और सत्युग बीत जाने के बाद त्रेता युग आ गया ।  . इस मध्य उस कछुवे ने अनेक बार अनेक योनियों में जन्म लिया और प्रत्येक जन्म में भगवान की प्राप्ति का प्रयत्न करता रहा । अपने तपोबल से उसने दिव्य दृष्...

शंख का पौराणिक महत्व और पांचजन्य शंख की कुछ अबूझ पहेलियां तथा घरों में शंख रखने का महत्व

महाभारत में कई प्रकार के शंखों का वर्णन है , श्री कृष्ण के पास पाञ्चजन्य, अर्जुन के पास देवदत्त, युधिष्ठिर के पास अनंतविजय, भीष्म के पास पोंड्रिक, नकुल के पास सुघोष, सहदेव के पास मणिपुष्पक था। सभी के शंखों का महत्व और शक्ति अलग-अलग थी।   शंखों की शक्ति और चमत्कारों का वर्णन महाभारत और पुराणों में मिलता है। शंख को विजय, समृद्धि, सुख, शांति, यश, कीर्ति और लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शंख नाद का प्रतीक है। शंख ध्वनि शुभ मानी गई है। हालांकि प्राकृतिक रूप से शंख कई प्रकार के होते हैं। इनके 3 प्रमुख प्रकार हैं- दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख। इन शंखों के कई उप प्रकार होते हैं।  पाञ्चजन्य शंख का रहस्य :  पाञ्चजन्य बहुत ही दुर्लभ शंख है। समुद्र मंथन के दौरान इस पाञ्चजन्य शंख की उत्पत्ति हुई थी। समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से 6वां रत्न शंख था। अपने गुरु के पुत्र पुनरदत्त को एक बार एक दैत्य उठा ले गया। उसी गुरु पुत्र को लेने के लिए वे दैत्य नगरी गए। वहां उन्होंने देखा कि एक शंख में दैत्य सोया है। उन्होंने दैत्य को मारकर...

महर्षि वाल्मीकि रामायण के रचयिता

 हुआ था। ऋषि मुनि बनने से पूर्व वे एक कुख्यात डाकू थे। उनका नाम रत्नाकर था। मनुस्मृति के अनुसार वे प्रचेता, वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्य आदि के भाई थे। उनके बारे में एक और किंवदन्ती है कि बाल्यावस्था में ही उनको एक निःसंतान भीलनी ने चुरा लिया था। भीलनी ने रत्नाकर का बड़े ही प्रेम से लालन-पालन किया। भीलनी के जीवनयापन का मुख्य साधन दस्यु कर्म का था। भीलनी बुरे कर्म और लूट-पाट से रत्नाकर का पालन-पोषण कर रही थी। इसका रत्नाकर पर काफी प्रभाव पड़ा और उन्होंने भी बड़े होकर अपने भरण-पोषण के इसे ही अपना लिया था। रत्नाकर को लगा लूट-पाट हत्या ही उनका कर्म है। जब वाल्मीकि एक तरूण युवा हो गए तब उनका विवाह उसी समुदाय की एक भीलनी से कर दिया गया। विवाह बाद रत्नाकर कई संतानों के पिता बने और उन्हीं के भरण-पोषण के लिए उन्होंने पाप कर्म को ही अपना जीवन मानकर और भी अधिक घोर पाप करने लगे। एक बार उन्होंने वन से गुजर रहे साधुओं की मंडली को ही हत्या की धमकी दे दी। साधु के पूछने पर उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि वे यह सब अपने पत्नी और बच्चों के लिए कर रहे हैं। तब साधु ने उन्हें ज्ञान दिया और कहा कि जो भी ...

वीर एकलव्य आधुनिक तीरंदाजी खेल की पद्य ति का जन्मदाता

एकलव्य महाभारत का एक पात्र है। वह राजा हिरण्य धनु नामक निषाद के पुत्र थे। एकलव्य का मूल नाम अभिद्युम्न था। एकलव्य को अप्रतिम लगन के साथ स्वयं सीखी गई धनुर्विद्या और गुरुभक्ति के लिए जाना जाता है। पिता की मृत्यु के बाद वह श्रृंगबेर राज्य के शासक बने। अमात्य परिषद की मंत्रणा से उनहोने न केवल अपने राज्य का संचालन किया , बल्कि निषादों की एक सशक्त सेना गठित कर के अपने राज्य की सीमाओँ का विस्तार किया। महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार एकलव्य धनुर्विद्या सीखने के उद्देश्य से द्रोणाचार्य के आश्रम में आया किन्तु निषादपुत्र होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे अपना शिष्य बनाना स्वीकार नहीं किया। निराश हो कर एकलव्य वन में चला गया। उसने द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई और उस मूर्ति को गुरु मान कर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। एकाग्रचित्त से साधना करते हुये अल्पकाल में ही वह धनु्र्विद्या में अत्यन्त निपुण हो गया। एक दिन पांडव तथा कौरव राजकुमार गुरु द्रोण के साथ आखेट के लिये उसी वन में गये जहाँ पर एकलव्य आश्रम बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था। राजकुमारों का कुत्ता भटक कर एकलव्य के आश्रम में जा पहुँच...