दैनिक अखबारों के लिए आवश्यक मंत्र

# दैनिक अख़बार और हम#
           कवि कुमार विश्वास कहीं लिखते है कि ;
'जिसके विरुद्ध था युद्ध उसे
हथियार बना कर क्या पाया?
जो शिलालेख बनता उसको
अख़बार बना कर क्या पाया?'
आज अख़बार की दुनिया दोतरफ़ा संकट में है। मूल्यों का क्षरण तो लगातार हो ही रहा है, और आर्थिक रूप से पड़ने वाली मार तो और ज़्यादा संकट में डालेगी।
अभी करोना रूपी महामारी को देखते हुए अख़बार सहित सभी उद्योग संकट में हैं, किन्तु ऐसा नहीं है कि पूरा का पूरा उद्योग जगत ठप पड़ जाएगा।  जैसे विनाश के पश्चात सृजन स्वाभाविक प्रक्रिया है, उसी प्रकार सभी उद्योग बहुत तेजी से अपने गति को प्राप्त कर लेंगे, ऐसा विश्वास है।
   आजकल अखबारी जगत में संपादकीय , विज्ञापन एवम् प्रसार विभाग केवल मुनाफ़े और आज्ञा पर ही जीवित हैं ; होना भी चाहिए क्योंकि हर उद्योग का आधार ही मुनाफा है।
असल बात तो यह है कि हिंदुस्तानी अख़बार दुनिया का एकमात्र ऐसा सुंदर उत्पाद (प्रोडक्ट) है, जो अपनी लागत मूल्य से कम से कम पाँच या दस गुना कम मूल्य में बिकता है क्योंकि शेष लाभ विज्ञापन आधारित माना जाता है।
इसी कारण संपादकीय विभाग भी विज्ञापन विभाग के दबाव में रहता है।
इस मूल्य की क्षीणता के साथ ही वर्तमान समय में देशबन्दी ( लॉक डाउन ) के कारण अख़बारी दुनिया में केवल खानापूर्ति मात्र हो रही है।अब ज्वलंत प्रश्न यह है किअख़बारों को संचालित करने वाली व्यवस्था, जिसे विज्ञापन कहते हैं, वो अख़बारों से गायब है, और जब विज्ञापन नहीं होंगे तो अख़बार कैसे ज़िंदा रहेगा ?
  अब इसी समय कुछ करेक्टिव मेजर्स लिए जाने की आवश्यकता है, यही से प्रसार एवम् संपादकीय का कार्य प्रारंभ होता है ,हमारे  एक वरिष्ठ ने एक बार समझाया था कि जब समय परेशानी का हो तभी अख़बारों के सही प्रबंधन का समय होता है, यह समय अभी आ गया है! हमे घर पर सुन्न ( किंकर्तव्यविमूढ़ ) बैठे छात्रों, व्यवसायियों , महिलाओं एवं बुजुर्गों को लक्ष्य करके ऐसी पठनीय सामग्री उपलब्ध कराना होगा जो उनके लिए उपयुक्त एवम् सटीक हो, इस समय विज्ञापन के अभाव में सभी समाचार पत्रों के पास स्थान की कमी नहीं है,भरपूर पठनीय सामग्री देने में सक्षम हैं।जैसे हम छात्रों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए प्रतिदिन वस्तुनिष्ठ क्वेश्चन बैंक , टेक्निकल छात्रों के लिए कुछ नई टेक्नोलॉजी पर आधारित सामग्री; घर की महिलाओं के लिए फैशन, कूकरी एवम् बचत प्रबंधन की जानकारी; व्यवसायियों के लिए नए टैक्स प्रबंधन , व्यवसाय को पुनर्गठित एवम् पुनर्व्यव स्थित करने हेतु सुझाव; ज्योतिष एवम् धर्म पर आधारित पूरे पेज की आवश्यकता है।नई पीढ़ी आ रही है और हमें यह देखना है कि हम नई तकनीक का उपयोग करते हुए किस तरह समाचार पत्रों को नए पढ़ने वालों के लिए कितना आकर्षक बना सकते हैं। 
  ऐसी स्थिति में यह भी जानना आवश्यक है कि जैसे कोई नया प्रोडक्ट बाज़ार में आता है, ज्यादा बेचने की होड़ में सभी उत्पादक कंपनियां क्वालिटी मेंटेन करने के बजाय तुरंत अपने दाम काम करके ज्यादा लोगो तक पहुंचने का प्रयास करते हैं, यह किसी भी प्रोडक्ट के लिए एक आत्मघाती कदम साबित हो रहा है। क्वालिटी पर कॉम्प्रोमाइज करते करते प्रोडक्ट फुटपाथ पर आ जाता है, इस समय ज्यादातर अख़बार समूह यही कर रहे हैं।
 इसी के साथ ही साथ प्रसार विभाग अपने सभी पुराने पाठकों , विक्रेताओं की सूची पर कार्य करना प्रारंभ करेंगे, जिससे उपयुक्त समय आते ही अपने प्रोडक्ट की उपादेयता के आधार पर समुचित स्थान पर अपने प्रोडक्ट को पहुंचा सकें।
  वैसे भी विश्व के कई देशों में प्रिंट मीडिया ने अपना रुख इंटरनेट मीडिया की ओर काफ़ी पहले कर लिया है, बीते एक दशक से तो डिजिटल संस्करण श्रेष्ठ विकल्प बनकर उभर रहे हैं। हालांकि डिजिटल संस्करणों को टक्कर देना मुश्किल होगा ,किन्तु असंभव नहीं ! 
  यह भी सत्य है कि सभी हालात यथास्थान पर आने पर सभी समाचार पत्र अपने 15- 20%  पुराने पाठकों को खो देंगे, किन्तु नए पाठक पाने के लिए सभी समाचार पत्रों को अपने स्वरूप में आमूल चूल परिवर्तन करना होगा।
और यह भी तय है कि प्रसार अच्छा करने हेतु प्रयास करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि पुराने संपादकीय सोच को बदला जाए।
इसी के साथ प्रसार अच्छा होगा और क्वालिटेटिव पाठक होंगे तो विज्ञापन स्वतः आयेंगे। हालांकि यह एक भगीरथ प्रयास है, इतना आसान भी नहीं है; 
  यदि समय रहते  अख़बार नहीं संभल पाए तो आर्थिक, सामाजिक और व्यवस्थाजन्य तो कमज़ोर होंगे ही, साथ में अस्तिव भी संकट में आ जाएगा। जागना आवश्यक है, वर्ना, अख़बार का भविष्य खतरे से खाली नहीं है ।

 

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