बड़ भागी श्री हनुमान जी

कपि सेवा बस भए कनौड़े, कह्यौ पवन सुत साउ।

दैवै को न कछू ऋनिया हौं, धनिक तू पत्रा लिखाउ।।

 विनय पत्रिका में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है, जब राघवेन्द्र लंका को जीत कर अयोध्या में राजा के रूप में स्थापित हो गए तो सभी लोगों को धन्यवाद् ज्ञापित कर अपने घरों को जाने को बोल दिया, उसी समय श्री रामचंद्र जी ने श्री हनुमान जी से कहा हे पवनसुत आप मेरा यह पत्र स्वीकार करें , श्री हनुमान जी ने पूछा प्रभु इसमें क्या लिखा है ? प्रभु बोले इसमें यही लिखा है कि आपको देने के लिए हमारे पास कुछ नहीं है, सजल नेत्रों से श्री राम जी ने कहा कि श्री हनुमान जी आपके कारण  श्री सुग्रीव महराज को किस्किंधा की राजगद्दी मिल गई, श्री विभीषण जी को लंका का साम्राज्य मिल गया और मुझे भी अयोध्या का राजा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, आपको क्या मिला, श्री हनुमान जी महराज का उस समय का जबाव अत्यंत सुंदर था, 
 श्री हनुमान जी महराज बोले हे राघवेन्द्र श्री सुग्रीव को एक पद प्राप्त हुआ किस्किंधा का, विभीषण को भी एक पद प्राप्त हुआ लंका का, और क्षमा करें आपको भी अयोध्या की गद्दी के रूप में एक ही पद प्राप्त हुआ,  श्री हनुमान जी ने राम जी के चरणों में शीश झुका कर कहा मुझे तो आपके दो दो पद प्राप्त हुए हैं, मुझसे ज्यादा भाग्यवान इस संसार में कौन है : 
 इसी पर श्री तुलसीदास जी लिखते हैं; 
 हनूमान सम नहिं बड़भागी | नहिं कोउ राम चरन अनुरागी ||
  श्री रामचंद्र जी की जय,  श्री हनुमान जी महाराज की जय ।।

Comments

Popular posts from this blog

ऋषि,मुनि,साधु,संत एवम् सन्यासी

कोरोना.... साक्षात मौत ....

सिंदूर रोली का पेड़