इतने राम कहां से लाऊं।।


आज के समय में देश की हालत कुछ ऐसी ही हो गयी है, सब ज्ञानी, मूर्ख हो गए है और सारे मूर्ख, ज्ञानी।।
कलयुग की तुलना में त्रेता युग हर मामले में बेहतर कहा जाता है और आखिर हो भी क्यों नहीं, उस समय कम से कम इस बात का सुकून था कि रावण एक ही था और उसे एक राम ने ठिकाने लगा दिया लेकिन आज के परिवेश में हालात बहुत पेचीदा हैं। अब तो गली-गली में रावण हैं। इन्हें मारने के लिए इतने राम कहां से लाएं ? पुरातन गाथाओं में रक्तबीज नाम के एक दैत्य के बारे में पढ़ा है कि उसके लहू की हर बूंद से सैकड़ों नए रक्तबीज पैदा हो जाते थे।
कलयुग में लगता है कि यह वरदान आधुनिक रावणों को मिल गया है। ।
इसी प्रसंग की एक कविता भी है, जो प्रासंगिक भी लगती है;

*कलयुग बैठा मार कुंडली ,
जाऊ तो मै कहाँ जाऊँ।
अब हर घर में रावण बैठा ,
इतने राम कहा से लाऊ।

दशरत कौशल्या जैसे ,
मात पिता अब भी मिल जाये। 
पर राम सा पुत्र मिले ना ,
जो आज्ञा ले वन जाये। 
भरत लखन से भाई को में ,
ढूंढ कहा से अब लाऊ। 
अब हर घर में रावण बैठा ,
इतने राम कहा से लाऊ।।*

#anuragsingh

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