रामचरित मानस में वर्णित शबरी का चरित्र चित्रण
#शबरी - शबरी जंगल क्षेत्र में रहने वाले एक भील की कन्या थी, उसके पिता ने कम उम्र में जब उसका विवाह करना चाहा तो शबरी घर से भाग निकली और भागते हुए अनजान तरीके से मुनि मतंग के आश्रम के निकट पहुँच गई. जब वो घर से निकली और आश्रम की तरफ आई तो शाम हो चुकी थी. वो आश्रम के पीछे छुप गई भुखी प्यासी और फिर उसने आश्रम के निकट ऋषीयों के भोजन किये हुए जूठे पत्तल चाट कर अपना थोडी बहुत भुख मिटाई लेकिन जूठन खाते ही उसके चित्त में शांति और मन में एक अनजान प्रसन्नता और ऊर्जा भर गई.
रात भर छुप के रही, जब मुनि जन सुबह स्नान के लिये निकले तो शबरी ने सोचा जब तक ऋषी लौट के आते हैं मैं आश्रम के बाहर साफ सफाई कर देती हूँ क्युँकि अपने घर पर भी यही कार्य हर सुबह वो करती ही थी और उसे आदत थी, उसने झाडू लगाया. मुनि वापस आये तो देखा, किसी ने आश्रम साफ सुथरा किया है, उन्होंने ईधर उधर देखा तो झाडीयों के पीछे छुपी हुई शबरी नजर आई. मुनि मतंग ने उसे पास बुलाया और फिर उसका परिचय जाना, उसने सब बात बतलाई. तब मुनि ने कहा पुत्री तुम्हें अपने घर लौट जाना चाहिये, तुम्हारे माता पिता परेशान होंगे. शबरी ने कहा मुनिवर मैं अपनी भूख मिटाने के लिये आप लोगों के भोजन किये हुये जूठे पत्ते खाए, तभी से मुझे एक अलग आभाष और खुशी का अनुभव हो रहा है मैं निरक्षर हूँ कुछ नहीं जानती लेकिन कुछ अदभुद ऊर्जा मिल गई है, आप मुझे कृपया जाने को न कहें और वो रो पडी. मैं आश्रम में साफ सफाई किया करुंगी और आप लोगों की सेवा का अवसर मुझे दिजिये. मतंग मुनि उसके इस निश्छल सेवा भाव से प्रसन्न हुये और उसे आज्ञाँ दे दी और पास में ही अपने लिये रहने को एक झोपडी बना लेने को कह दिया.
शबरी बचपन से मुनि मतंग की सेवा करती रही. तब एक दिन मुनि मतंग ने उसकी गुरु भक्ति से प्रसन्न हो के शबरी को वरदान दे दिया कि पुत्री मेरे जाने का समय निकट आ रहा है, मैं तुम्हारी गुरु सेवा से अत्यंत प्रसन्न हूँ, तुम्हारी इस गुरु भक्ति और ईश्वर के प्रति विश्वास से एक दिन स्वयं इस जगत के पालक परमब्रह्म, श्री राम रूप में अपने अनुज लक्ष्मण के साथ तुम्हें दर्शन देंगे और तुम्हारा जीवन सफल हो जाएगा. तुम उनका सत्कार करना और भक्ति का उपदेश उनसे लेना. मुनि मतंग का संसार से विदा लेने का वक्त आ गया था और मुनि मतंग समय आने पर संसार से चले गये,
शबरी ने सोचा श्री राम आएंगे पर गुरु ने यह तो नहीं बताया कब आएंगे, क्या पता आज ही आ जाएं अत: वो उनके सत्कार के लिये हर रोज रास्ता साफ करती, उसमें जल का छिडकाव करती, पुष्प से रास्ते सजाती और फिर जंगल से खाने के लिये बेर लेके आती वो भी चख के कि कौन सा मीठा है. इसी क्रम में उसे वर्षों बीत गये. अन्य मुनियों के चेले और आश्रमवाशी कहते कि शबरी पगला गई है जब से मुनि गये हैं. लेकिन धीरे-धीरे उनको पता चला कि शबरी की गुरु भक्ति और राम के प्रति स्नेह से वो सिद्धी को प्राप्त हो गई है. आज अचानक श्री राम आश्रम में आये और शबरी रास्ते में राम जी के लिये फूल बिछा रही थी. राम आये बोले हमें माता शबरी से मिलना है माता शबरी सम्बोधन सुनते ही शबरी समझ आ गये प्रभु और उसने अश्रु जल से ही श्री राम के चरणों को धो डाला राम जी ने जूठे बेर खाए और लक्ष्मण को भी दिये. परंतु लक्ष्मण जी ने बेर जूठे हैं ये सोच कर संकोच वश भ्राता के कहने पर ले तो लिये परंतु उसे खाया नहीं छुपाते हुये उसे इस तरह से जोर से फेंक दिया कि वो सीधे अत्यंत दूर जाकर हिमालय में गिरे. उन मे से कुछ बेर लिये और फिर शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया. नवधा भक्ति में श्री राम ने नौ प्रकार की सुंदर भक्ति का उपदेश दिया है मनुष्य इनमें से यदि कोई एक प्रकार की भक्ति करें तो भी वो अपने मानव जीवन के अंतिम लक्ष मोक्ष को प्राप्त कर सकता हैं जो इस प्रकार से है.
(१) पहली भक्ति का प्रकार है केवल संतों का ही संग करना, क्युँकि संतों के संग से ज्ञान, भक्ति, विवेक जाग्रत हो जाता है और मनुष्य को कुछ न कुछ सीखने को अवश्य मिलेगा जिससे वो अपने लक्ष को प्राप्त कर सकता है.
(२) श्री हरि के कथा प्रसगों की चर्चा भी भक्ति है क्युँकि जब श्री हरि कथा का प्रसंग आता है तो मन और चरित्र अपने आप ही निर्मल हो जाता है, पाप को कोई स्थान नहीं मिल सकता और मनुष्य अच्छा ही सोचेगा. सोच अच्छी हो तो अपने भौतिक, आध्यात्मिक उन्नति अपने आप होगी.
(३) श्रेष्ठ गुरु की सेवा, शबरी को गुरु सेवा का फल मिला और उसी का प्रताप था कि वो इस नवधा भक्ति को सीख कर संसार के सामने रख सकी और श्रेष्ठ गुरु से भी ज्यादा मान निष्कपट सेवा करने वाले का है, इसलिये सेवा मे कपट न हो, शायद यही कारण है कि मुनि मतंग को बहुत कम लेकिन शबरी को जानने वाले आज भी ज्यादा हैं.
(४) भगवान के गुणों का कपट छोड कर वर्णन करना भी भक्ति है. भगवान के गुण क्या है और किस गुण का वर्णन किया जाए? उस पर विचार कर चर्चा की जानी चाहिये.
(५) दृड विस्वास के साथ मंत्र जप – जैसे “ऊँ नम: शिवाय “ या “राम” नाम का जप, जैसे वाल्मिकि ने किया और ब्रह्मर्षी बन गये.
(६) शांत चित्त और दया पूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करना, यह भी भक्ति है.
(७) संसार में सभी प्राणीयों को सम भाव से व्यवहार और उनमे भी प्रभु को देखना, यह भी भक्ति है.
(८) जो मिला उसी पर संतोष करना.
(९) किसी भी प्रकार का छल न करना और भगवान पर भरोषा रखना.
ये नौ प्रकार की भक्ति स्वय्ं श्री राम ने बतलाई है इनमें से कोई भी एक आप चुन सकते हैं जो आपको करने में सुगम (कम्फर्टेबल) लगे, अपने समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार आप अपना लें, यह सबसे उत्तम मार्ग है, जिसमें एक फूटी कौडी की जरुरत नहीं है. संसार का सबसे धनी और सबसे निर्धन दोनों के लिये भगवान ने मोक्ष का द्वार इन भक्तियों के माध्यम से खोल दिया है. धन दौलत से गरीब व्यक्ति ये आरोप कभी नहीं लगा सकता या उसे लगाना चाहिये कि प्रभु मेरे पास क्या है या आपने मुझे क्या दिया है, मैं कैसे भक्ति करुं, कैसे पूजा करुं, या कैसे तीर्थ नहाऊँ?
नवधा भक्ति में न तो किसी के बहकावे, किसी के जाल मे फंसने या फिर किसी तंत्र आदि में फंसने की बात है, ना किसी मंदिर में दर्शन करने के लिये लाइन लगाने या पैसा दे कर जल्दी दर्शन पाने की बात है, या तीर्थ में जाने की बात है.इसके बाद शबरी ने प्रभु से कहा राघव आप अकेले कब तक इन घने जंगलों में देवि सीता को खोजेंगे इसलिये बेहतर होगा कि आप सुग्रीव से मित्रता कर लें वो ऋष्यमूक पर्वत पर रहते हैं. उनके पास बहुत सी वानर सेना है जो जंगलों में जल्दी ही देवि सीता को खोजने में मदद कर देंगे और जल्दी ही आप पता पा लेंगे. इसमें कोई संदेह नहीं है क्युँकि सुग्रीव के पास हनुमान जी जैसे सिद्ध हैं. श्री राम ने कहा अब हम सुग्रीव से मिलने जाते हैं इसलिये आज्ञाँ दिजिये. शबरी ने कहा भगवन आप मुझे इस संसार से जाने की आँज्ञा दिजिये और श्री राम को प्रणाम करके अचानक शबरी का शरीर एक दिव्य ज्योति में बदल कर आकाश में विलिन हो गया.
Comments
Post a Comment