प्रभु मुद्रिका मेलि मुखी माहीं
प्रभु मुद्रिका मेली मुखी माहीं जलधि लांघी गए अचरज नाहिं।।
प्रभु श्री रामचन्द्र जी ने माता सीता की खोज में बंदरों की सेना को दक्षिण दिशा में श्री अंगद जी के नेतृत्व में भेजा, तो सभी बंदर श्री राम चन्द्र जी से आशीर्वाद प्राप्त कर चल दिए, आशीर्वाद प्राप्त करने के उपक्रम में श्री हनुमान जी सबसे पीछे चल रहे थे, तो इसके लिए उनसे लोगों ने पूछा आप सबसे पीछे क्यों हैं, तो उन्होंने बड़ा सुंदर उत्तर दिया, ग्रहण करने में सबसे पीछे एवम् देने में सबसे आगे रहना चाहिए,
वैसे भी आचार्य व्यास ने पुराण में लिखा, धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायाम्। महाजनो येन गतः स पन्थाः। यानी, धर्म का रहस्य अथवा स्वरूप इतना गहन है, मानो वह गुफाओं में छिपा है। अतः सभी उसका गहन अध्ययन नहीं कर सकते। सुगम मार्ग यही है कि जिन्होंने घोर तपस्या कर उस परम तत्व को जान लिया, तथा जिस रास्ते वे चले, उसी मार्ग पर चलना चाहिए।
खैर श्री हनुमान जी सीता जी की खोज में जंगल में गए तो उन्होंने श्री राम जी की दी हुई मुद्रिका को अपने मुख में रख लिया था, लोगों ने पूछा ऐसा क्यों तो कुछ लोगों ने बताया कि श्री हनुमान जी वस्त्र इत्यादि तो धारण करते नहीं थे, इसलिए उन्होंने मुद्रिका मुंह में रख लिया , किन्तु नहीं श्री हनुमान जी ने इसका उत्तर दिया, चूंकि मुद्रिका पर श्री राम अंकित था, तो इसे रखने का सबसे उपयुक्त स्थान मुख ही था।।
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