माता सीता की खोज प्रसंग
जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सबही कर नायक॥
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥
कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुं अपर गिरिन्ह कर राजा ॥
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहिं नाघउं जलनिधि खारा॥
सहित सहाय रावनहि मारी। आनउं इहां त्रिकूट उपारी॥
जामवंत मैं पूंछउं तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही॥
एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥
तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥
माता सीता की खोज में जाने के लिए जामवंत जी से श्री अंगद जी कहते हैं मैं पर्वत के पार माता सीताजी की खोज में चला तो जाऊंगा, लेकिन लौटने में थोड़ा संसय है,जामवंत जी ने कहा आप सबसे योग्य हैं किन्तु आप सेना के नायक हैं आपको भेजना उचित नहीं होगा।
तब जामवंत जी ने श्री हनुमान जी से कहा आप अपने बल कि पहचानें , आप पवन पुत्र हैं, आप बल बुद्धि ,विवेक एवम् ज्ञान के सागर हैं, रमकाज के लिए ही आपका अवतार हुआ है, ऐसा सुनकर श्री हनुमान जी ने पर्वताकार रूप धारण किया,
तभी जोश में आकर श्री हनुमान जी बोले, मैं इस खारे समुद्र को खेल में ही लाँघ सकता हूं,और सहायकों सहित रावण को मारकर त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जामवंत जी! मैं आपसे पूछता हूँ, आप मुझे उचित सीख दे कि मुझे क्या करना है।।
तब जामवंत जी बोले हे तात! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजी को देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्री रामचन्द्र जी अपने बाहुबल से ही राक्षसों का संहार कर सीताजी को ले आएँगे, एवम् केवल आमोद के लिए ही वे वानरों की सेना साथ लेंगे।।
जय श्री राम , जय श्री हनुमान ।।
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