अख़बार का अर्धसत्य
दैनिक अख़बार और हम
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मानव सभ्यता के विकास के साथ साथ समाचार पत्र भी अस्तित्व में आया।इसी बीच करोना के दुष्प्रभावों के बीच में दस दिन घर पर नहीं आया तो दो-तीन दिन बाद इंतजार करना भी बंद कर दिया।अखबारों के प्रबंधन ने बाजार एवं वितरकों में विश्वास दिलाया कि अख़बार के मध्यमा से करोना नहीं फैलता ,विक्रेताओं ने रोजी रोटी की समस्या को देखते हुए अख़बार बाटना पुनः प्रारंभ कर दिया ,घरों में काफी दिनों बाद आया तो उसे उठाकर पलटने में कोई उत्साह नहीं था। कुछ भी ऐसा नहीं था, जो उन दस दिनों में छूट गया लगा हो। अब अखबार अत्यंत कुपोषित और बीमार हालत ( हमारे एक वरिष्ठ के द्वारा दिया हुआ नाम ) में आ रहा है, चेहरे की रौनक उतरी हुई है।
पहले के अखबारों की रौनक; बीस-बाइस रंगीन पेजों पर दुनिया भर की खबरें। देश , प्रदेश , शहर की खबरें। सिनेमा, बिजनेस, स्पोर्ट्स के पन्ने। युवाओं , महिलाओं के लिए अलग अलग परिशिष्ट। रंगीन तस्वीरों और शानदार सुर्खियों से सजेधजे अखबार। सबकुछ अत्यंत आकर्षक ,चकाचक और हर पृष्ठ पर विज्ञापन बेशकीमती जेवर की तरह सुशोभित होते थे। किसी नई नवेली दुल्हन की तरह आभूषणों और सौंदर्य प्रसाधनों से सुसज्जित और सुनियोजित। विज्ञापनों के आभूषण खत्म हो गए हैं। चेहरे का क्रीम पाऊडर गायब एवम् मांग सूनी है। सब कुछ श्रीहीन हो गया है। नेताओं के जन्मदिन निकल गए। आधे-पूरे पेजों पर अब कोई नहीं बता रहा कि वे युवा ह्दय सम्राट कहां हैं, जननायक कहां दम साधकर मोमबत्तियां जलाकर उद्घाटन कर रहे हैं, अभिनेता , अभिनेत्रियां नहीं बता रहे हैं कि उनका क्रश क्या है/ था, लुभावने अंडरगारमेंट्स, माल के प्रचार गायब हैं, सरकारी विज्ञापनों की खेप भी न के बराबर हो गई है, यह प्राइमरी पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चे को मिड दे मील से वंचित रखने जैसा है । इससे पहले कब ऐसा हुआ? याद नहीं आता ! शहरों में 50 फीसदी ही प्रतियां पाठकों तक जा पा रही हैं। ट्रेनों और बसों से जुड़ने वाले गंतव्यों पर तो तीन हफ्ते होने को हैं, जब बंडल उतरे थे। कहने को ये सैटेलाइट एडिशंस हैं। अब सैटेलाइट से ही बिना किसी के एडिशन के सहारे, घर बैठे मोबाइल पर ही खबरें पहुंच रही हैं। चुटकुले आ रहे हैं। शेर-शायरी भी। पुराने गानों की क्लिप। किसी महात्मा के प्रवचन। इतिहास के अनजाने पन्ने। एलबम में दशकों से भूले-बिसरे फोटो निकल रहे हैं और व्हाट्सएप पर चौंका रहे हैं-अरे ये रिंकी की शादी का फोटो!तब बबलू ऐसे लगते थे :वाह ; अखबार में यह सब कहां?
सुबह की चाय अखबार के बिना गले उतरने की आदत पक्की होने लगी है। दादा-दादी भी व्हाट्सएप पर आई लिंक में लगे हैं और ब्रेकिंग न्यूज घर वालों को या फोन पर दूर बैठे अपने बच्चों को बता रहे हैं। क्या अब अखबार अप्रासंगिक हो जाएंगे? डिजिटल मीडिया का खौफ प्रिंट को पहले ही मुश्किल में डाले हुए था, क्योंकि नई पीढ़ी के पास इतना समय नहीं है कि वे इत्मीनान से बैठकर पन्ने पलटें और चाय की चुस्कियां लें। उनके पास नैनो सेकंड्स हैंं। धैर्य तो बिल्कुल नहीं हैं। किसी भी लोक में जाकर कोई भी समाचार तत्काल प्राप्त करने का मोबाइल वरदान है उन्हें। वे अखबार पर निर्भर नहीं हैं। अब दादा-नाना की उम्र के लोग भी इस व्यवस्था से बेहतर कनेक्ट हो गए हैं।
24 घंटा अपने घरों में बंद रहकर हमारा बाहरी दुनिया से हल पल की जानकारी तत्काल मिलने लायक सुविधाजनक जुड़ाव अखबार के बिना भी बना हुआ है। बाहरी दुनिया में क्या चल रहा है, यह जानने के लिए हमारे पास इन दिनों साधन क्या हैं? 24 घंटे के न्यूज चैनल, एक-दो नहीं, बीसियों इंटरनेशनल, नेशनल, रीजनल और लोकल चैनल। मोबाइल फोन, जहां व्हाट्सएप, फेसबुक और मैसेंजर पर सूचनाओं, टिप्पणियों, तस्वीरों और वीडियो की बाढ़ आई हुई है। कहीं किसी जमाती ने अपना असली रंग दिखाया तो पता नहीं कहां से कहां होते हुए ताजे वीडियो और फोटो हमारी स्क्रीन तक आ ही जाते हैं। व्हाट्सएप पर सब किसी न किसी ग्रुप में हैं। मीडिया से संबंधित कई ग्रुप हैं, जहां संपादक, रिपोर्टर, अफसर, टिप्पणीकार लगातार सक्रिय हैं। शेयर कर रहे हैं। सबके फेसबुक पर अकाउंट हैं। ट्विटर पर सक्रिय हैं। चार लाइन के कटाक्ष से लेकर चार सौ शब्दों के विश्लेषण तक हर तरह का सामान सजा है। खबर के साथ कमेंट भी तत्काल।इसमें एक सुविधा यह भी है कि वन वे ट्रैफिक नहीं है ,यानि हम जो बोलेंगे आपको सुनना पड़ेगा ,हम अपनी प्रतिक्रिया भी मुक्त कंठ से व्यक्त कर सकते है। दिन भर मौत के तांडव के समाचार देख-देखकर जब माथा दुखने लगे तो राहत के लिए दूसरे चैनल हैं। खासकर दूरदर्शन के चैनल, जहां इसके पहले कभी लोग इतनी देर तक नहीं ठहरे होंगे।# कोरोना प्रसंग में यही अकेला कोना है, जहां रौनक बढ़ी है।# अब दोनों समय रामायण, महाभारत, बुनियाद और चाणक्य जैसे धारावाहिक भारतीय दर्शकों को बांधे हुए हैं। बाहर अदृश्य मौत के भयावह शोर में राम और कृष्ण के संवाद घरों में गूंज रहे हैं। उपनिषद के सूत्र सुनाई दे रहे हैं। किंगमेकर चाणक्य से जनता रूबरू है। #सुबह अखबार की प्रतीक्षा अब पहले जैसी नहीं रही है। आ गया है इसलिए उलट - पलट लीजिए। #कहीं कुछ भी डिफरेंशिएटर नहीं है। कोई इन्नोवेशन ( नयापन ) नहीं। कोई नेक्स्ट लेवल नहीं। मौत सी बरसती खबरों के बीच आइडिएशन शून्य होना स्वभाविक है। कोई क्या एक्सक्लुसिव और ब्रेकिंग ला सकता है? यह ब्रेक खतरनाक है! अखबारों में होता क्या था? अखबार के पन्नों पर शहर धड़कता था। शहर की ही धड़कन बंद है तो अखबार तो बुझे बुझे प्रतीत होने ही हैं। अब पार्टी दफ्तरों में प्रवक्ता किसी का इंतजार नहीं कर रहे। ब्यूरोक्रेट कोराेना पॉजिटिव हैं। जाए कोई पेज थ्री के लिए उनके सपरिवार इंटरव्यू करने और पूछे सवाल कि मैडम से पहली बार मिले थे कैसे प्रपोज किया था? आपके फेवरेट टूरिस्ट डेस्टिनेशन कौन से हैं? पहली मूवी कब देखी थी? विदेश में बेटे से कब बात हुई थी? पाठकों के लिए क्या संदेश है? अख़बार केवल समस्या छाप रहे हैं, कोई अख़बार यह सुनने को तैयार नहीं कि भईया जो वर्ग किन्हीं कारणों से लॉक डाउन में घरों में कैद है, उसके सामने तुम्हारी पैंट खुल रही है, हम जब अपने संघर्ष के दिनों में दिल्ली में हुआ करते थे,एक अख़बार अपनी बची हुई प्रतियों को स्कूलों में छात्रों के पास भेज देता था, हमने इसके पीछे का मर्म पूछा तो पता चला कि यही स्कूलों का छात्र हमारा कल का पाठक है , हम नए पाठकों की पौध तैयार कर रहे हैं, तो भाई साहब छात्रों , स्कॉलर्स एवम् युवा बिज़नेस वाले को क्या परोस रहे हो ? जिससे आपके अख़बार में उसका मन लगे, क्या नई चीज है ? केवल समस्या ,वो भी अध कचरी ,जिनका कोई समाधान नहीं है, और है भी तो उसके निदान में आपका क्या योगदान है! सभागार सूने पड़े हैं। नियति अपना नाटक सारे संसार में खेल रही है। थिएटर के कलाकारों का कोई काम नहीं है। गैलरियाें की दीवारों पर टंगी पेंटिंग सन्नाटे में हैं। सिनेमाहॉल ताले में हैं। अंधेरे परदे पर रोशनी का खेल बंद हो चुका है। गाना, बजाना, पार्टी, दावत, कथा, प्रवचन, भंडारा, शादी, समारोह, जलसा समेट दिए गए हैं। मॉल्स धूल खा रहे हैं। बड़े-बड़े ब्रांड्स के शोरूम बंद पड़े हैं। दुनिया की चकाचौंध बस इतनी ही है। सड़कों पर दौड़ते वाहन कहां समा गए। दो मरे, चार घायल जैसे स्थाई शीर्षक अखबारों से गायब हो गए हैं। मौत की खबरें अपने आसपास से आने लगी हैं। हर तरह की सुर्खियां शाम तक छोटी-बड़ी स्क्रीन पर बरसकर थम जाती हैं।# सुबह आंगन में अखबार शोकसंदेश पत्र की तरह पड़े दिखते हैं। नाम देखा और तेरहवीं की तारीख। और कोना फाड़ा ...और बस..# # 13 अप्रैल ' 20#
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